उत्तराखंड सरकार ने दिल्ली में एक भव्य उत्तराखंड भवन का निर्माण कराया, जो राज्य के लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए बनाया गया था। लेकिन राज्य संपत्ति विभाग के हालिया आदेश ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह सार्वजनिक निवेश जनता के लिए नहीं है। यहां तक कि स्तर 13 से नीचे के अधिकारी, जैसे डीएम, एसएसपी और सीडीओ को भी इस सुविधा में ठहरने के लिए देहरादून में विभागीय सचिव से अनुमति और आवंटन लेना होगा।
जनता के लिए बना निवास, जनता के लिए ही नहीं
उत्तराखंड निवास के निर्माण पर भारी खर्च किया गया, जो सार्वजनिक धन से वित्तपोषित है। इसका उद्देश्य राज्य के लोगों को दिल्ली में सस्ती और सुविधाजनक आवास सुविधा प्रदान करना था, चाहे वह चिकित्सा उपचार, शिक्षा या अन्य आवश्यक कार्यों के लिए हो। लेकिन अब यह सुविधा नौकरशाही की लालफीताशाही का प्रतीक बन गई है, जो केवल कुछ विशेष लोगों तक ही सीमित है।
जब जनता के लिए नहीं, तो क्यों बनाया?
उत्तराखंड ऐसा राज्य है जहां के लोग अक्सर दिल्ली जीवन-रक्षक चिकित्सा उपचार, शिक्षा, या अन्य आवश्यक कार्यों के लिए जाते हैं। इनमें से कई महंगे होटल या गेस्ट हाउस का खर्च नहीं उठा सकते। इसके बावजूद, जिस भवन को उनकी समस्याओं को कम करने के लिए बनाया गया था, वह अब एक बंद दरवाजे की तरह खड़ा है।