चुनावी शक्ल अख्तियार करता जा रहा है बदरीनाथ धाम का कंसर्ट व शंख विवाद
कंसर्ट व शंख विवाद को लेकर अलग-अलग तर्कों से माहौल गर्म
बदरीनाथ। बदरीनाथ धाम में शंख बजाने की परंपरा को लेकर मुरली मनोहर जोशी व मंत्री सतपाल महाराज के तर्कों से उठे बवाल के बीच धाम के पूर्व धर्माधिकारी भुवन चंद्र उनियाल ने इसके धार्मिक और पौराणिक कारणों की विस्तृत व्याख्या की है।
बदरीनाथ में हाल में हुए देवभूमि कल्चरल फेस्टिवल में संगीत कार्यक्रम को लेकर पर्यटन एवं धर्मस्व मंत्री सतपाल महाराज और भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी के अलग-अलग मत सामने आए हैं। इस बीच चारधाम तीर्थ पुरोहित महापंचायत और ज्योतिर्मठ की ओर से भी आयोजन को लेकर आपत्ति जताई गई है।
पूर्व धर्माधिकारी भुवन चंद्र उनियाल ने बताया कि बदरीनाथ धाम में भगवान विष्णु साक्षात विराजमान माने जाते हैं। इसलिए आवाहन के लिए शंख बजाने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने पौराणिक मान्यता का उल्लेख करते हुए कहा कि तुलसी ने बदरीनाथ क्षेत्र में भगवान नारायण की प्राप्ति के लिए तपस्या की थी। शंखचूड़ से जुड़े प्रसंग और बाद में तुलसी-शालिग्राम विवाह की मान्यता के कारण भी बदरीनाथ में शंख वादन नहीं करने की परंपरा बताई जाती है।
उनियाल के अनुसार, इसका अर्थ यह नहीं है कि बदरीनाथ की पूजा-पद्धति में शंख का कोई स्थान नहीं है। कपाट खुलने की तिथि की घोषणा से लेकर गाडू घड़ी यात्रा के विभिन्न पड़ावों तक शंख ध्वनि की परंपरा है। ज्योतिर्मठ स्थित नृसिंह मंदिर, पांडुकेश्वर और टिहरी राजदरबार से यात्रा प्रारंभ होने के अवसर पर शंख बजाया जाता है। हनुमान चट्टी तक भी यह परंपरा रहती है। इसके बाद धाम क्षेत्र में शंख ध्वनि नहीं की जाती। मंदिर में भगवान बदरीविशाल की नित्य पूजा, अभिषेक और महाभिषेक में शंख का प्रयोग होता है तथा भोग को भी शंख के माध्यम से पवित्र किया जाता है।
महाराज बोले-शंख में हड्डी की मान्यता, बाहर कोई रोक नहीं
विवाद के बीच पर्यटन एवं धर्मस्व मंत्री सतपाल महाराज ने कहा कि बदरीनाथ मंदिर के अंदर शंख नहीं बजाया जाता, जबकि मंदिर परिसर के बाहर शंख बजाने पर प्रतिबंध नहीं है। उन्होंने इसके पीछे शंख में हड्डी होने की धार्मिक मान्यता का उल्लेख किया। महाराज ने यह भी कहा कि बदरीनाथ में संगीत अथवा सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर पूर्ण प्रतिबंध की बात सही नहीं है। उनके अनुसार सीमांत क्षेत्र माणा सहित पूर्व में भी धार्मिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम होते रहे हैं और संगीत के माध्यम से भगवान की स्तुति की परंपरा रही है।
मुरली मनोहर जोशी ने कंसर्ट पर उठाए सवाल
दूसरी ओर भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी ने 19-20 सितंबर को बदरीनाथ में हुए देवभूमि कल्चरल फेस्टिवल में डीजे और संगीत कार्यक्रम को लेकर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने सवाल उठाया कि जिस स्थान पर शंख बजाना भी वर्जित माना जाता है, वहां तेज आवाज वाले संगीत और नृत्य का आयोजन कैसे उचित हो सकता है। जोशी ने इसे बदरीनाथ की धार्मिक एवं सांस्कृतिक मर्यादा के विपरीत बताते हुए केंद्र और राज्य सरकार से ऐसे आयोजनों पर रोक लगाने का आग्रह किया। उन्होंने शंकराचार्यों और संत-महात्माओं से भी इस मुद्दे पर आवाज उठाने की अपील की।
कंसर्ट विवाद बढ़ने के बाद चमोली प्रशासन ने आयोजन को लेकर भारतीय सेना से स्पष्टीकरण भी मांगा। प्रशासन की ओर से कहा गया कि कार्यक्रम में सांस्कृतिक गतिविधियों को लेकर जिला प्रशासन और राज्य सरकार की भूमिका नहीं थी।
गौरतलब है कि 11 अगस्त के सेना कि ओर से आयोजन के सम्बन्ध में जिला प्रशासन चमोली को एक पत्र भेजा गया था। इस पत्र के बाद डीएम चमोली ने अपने अधिकारियों को व्यवस्था बनाएं जाने सम्बन्धी पत्र जारी किये थे।
इस पूरे विवाद में एक ओर बदरीनाथ की प्राचीन पूजा-पद्धति और शंख वादन से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं हैं, तो दूसरी ओर धाम क्षेत्र में आयोजित आधुनिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों को लेकर परंपरा, मर्यादा और आयोजन की सीमा पर बहस तेज हो गई है। कांग्रेस, उक्रांद ,धार्मिक संस्थाएं व सामाजिक संगठन भी डीजे कंसर्ट व शंख बजाने सम्बन्धी मुद्दों पर खुलकर विरोध जता रहे है। धीरे धीरे बदरीनाथ धाम से जुड़ा यह मुद्दा चुनावी शक्ल अख्तियार करता जा रहा है।















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