उत्तराखंड का इतिहास पहाड़ी वीरांगनाओं की वीरगाथाओं से सम्पन्न है, ये वीरगाथाएं उत्तराखंड को राष्ट्रीय पहचान दिलाती है. गढ़वाल की एक ऐसी ही वीरांगना है तीलू रौतेली !
जिनके नाम पर आज उत्तराखंड में महिलाओं को पुरस्कृत किया जाता है, आज उनकी जयंती है. बाली उम्र में तीलू ने न सिर्फ अपने पिता, भाईयों और मंगेतर की शहादत का बदला लिया. बल्कि गढवाल के 13 दुर्ग फतह किए.
और कत्यूरि सैनिकों की कायरता का शिकार होकर शहीद हुई. सन 1661 आज ही के दिन यानि 8 अगस्त को पौड़ी जिले के चौंदकोट के गुराड़ तल्ला गांव में भूप सिंह के घर तीलू का जन्म हुआ.
15 बरस की उम्र में इड़ा तल्ला (श्रीकोटखल के पास) के रहने वाले, भवानी सिंह से उनकी सगाई हो गई थी. उस वक्त गढ़वाल में पंवार वंश और कुमाऊं में चंद वंश का शासन था.
इन दोनों वंशों के पहले समूचे उत्तराखंड पर कत्यूरी राजवंश यानि कत्यूरियों का शासन था. जो कि चंद और पंवार वंश के रहते क्षीण हो चुका था. लेकिन दोबारा सत्ता वापसी की चाह में अक्सर हमलावर रहता था.
खैरागढ़ पर कत्यूरियों के हमले के दौरान, हालाँकि, भूप सिंह ने आक्रमणकारियों से वीरतापूर्वक युद्ध लड़ा, लेकिन वह इस लड़ाई में अपने दो बेटों और तीलू के मंगेतर समेत शहीद हो गए.
कुछ दिनों बाद, कांडा में वार्षिक कौथिग मेले का समय था और तीलू रौतेली ने इसमें जाने की इच्छा व्यक्त की, उनकी ज़िद को देखकर, अपने पति और पुत्रों को खो चुकी, उनकी दुःखी माँ ने यह कहते हुए अपनी पीड़ा व्यक्त की-
“हे तीलू! तुम क्या हो! क्या तुम्हें अपने भाइयों की याद नहीं आती? तुम्हारे पिता की मौत का बदला कौन लेगा? अगर तुम्हें कहीं जाना भी है तो वह युद्ध का मैदान होना चाहिए… क्या तुम जा सकती हो? उसके बाद अपने कौथिग का आनंद लेती रहना!”
उनकी माँ के ताने ने तीलू रौतेली को झकझोर दिया था, इसने उनके मन पर ऐसा अमिट प्रभाव छोड़ा कि उन्होंने कौथिग जाने की अपनी इच्छा का भी त्याग कर दिया.
मात्र 15 वर्ष की तीलू रौतेली ने, अपने पिता की सेना की कमान संभाली, उन्होंने अपने मामा रामू भंडारी, सलाहकार शिवदत्त पोखरियाल और सहेलियों देवकी और बेलू की मदद से एक सेना तैयार की.
छत्रपति शिवाजी महाराज के मराठा सेनापति, श्री गुरु गौरीनाथ को सेना का प्रभार दिया गया था, तीलू रौतेली के निर्देशन में हज़ारों युवाओं ने प्रशिक्षण प्राप्त किया और गुरिल्ला युद्ध की रणनीति में महारत हासिल की.
कहा जाता है कि तीलू रौतेली ने कालिंकाखल में दुश्मन से लड़ाई लड़ी और इस तरह उन्होंने सरायखेत में, जहाँ उनके पिता की हत्या हुई थी, कत्यूरी सेना के सेनापति को पराजित करके अपने पिता की मौत का बदला लिया था.
कहा जाता है कि सात वर्षों के दौरान, उन्होंने लगभग 13 किलों पर विजय प्राप्त की, जिनमें खैरागढ़, टकौलीगढ़, इंदियाकोट भौंखल, उमरागढ़ी, सल्ड महादेव, मसीगढ़, सरायखेत, उफ़रईखल, कालिंकाखल, दुमैलगढ़, भालंगभौन और चौखुटिया शामिल थे.
15 मई 1683 को तीलू घर लौट रही थीं और रास्ते में उन्होंने नायर नदी देखी, वह अपनी तलवार किनारे पर रखकर नदी में नहाने चली गईं.
कत्यूरी के सिपाही, रामू रजवार ने पीछे से चुपके से, उन पर हमला कर दिया और उनकी हत्या कर दी, इस तरह अपनी अंतिम साँस तक दुश्मनों से लड़ने वाली उत्तराखंड की इस युवा योद्धा के जीवन का अंत हो गया.
इतनी कम उम्र में तीलू रौतेली की वीरता, साहस और पराक्रम की कहानी प्रेरणादायक है. इसलिए 2006 में, उत्तराखंड सरकार ने ‘वीरबाला तीलू रौतेली पुरस्कार’ की शुरुआत की.
ये महिलाओं और लड़कियों को उनके संबंधित कार्य क्षेत्रों में, असाधारण प्रदर्शन के लिए दिया जाता है.
कांडा गाँव और बीरोंखाल क्षेत्र के निवासी, तीलू रौतेली की याद में हर साल कौथिग का आयोजन करते हैं, और ढोल-दमाउँ और निशान के साथ तीलू रौतेली की मूर्ति की पूजा की जाती है.
तीलू रौतेली की स्मृति में गढ़वाल मंडल के कई गाँव में थड्या गीत गाये जाते हैं-
- ओ कांडा का कौथिग उर्यो
- ओ तिलू कौथिग बोला
- धकीं धे धे तिलू रौतेली धकीं धे धे
- द्वी वीर मेरा रणशूर ह्वेन
- भगतु पत्ता को बदला लेक कौथीग खेलला
- धकीं धे धे तिलू रौतेली धकीं धे धे













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